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Utera Cultivation


Utera Cultivation

Utera cultivation of utera kheti is a method of cultivation in which sowing of second crop is done just after the harvesting of paddy crop. This method is very popular in central India. It is also known as paira kheti (पैरा खेती).

What is utera fasal?

उतेरा फसल (Utera Fasal), मिश्रित फसल का एक आंशिक रूप है। इस लेख में हम इस विधि की प्रक्रिया और महत्व के बारे में जानेंगे।

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List of contents
(01). Origin
(02). Importance
(03). Climatic requirement
(04). Selection of climate
(05). Selection of site
(06). What is the proper time
(07). Method or procedure of utera cultivation
(08). Weed control
(09). Management of fertilizers and manures
(10). Thins to consider
(11). Management of insect-pests
(12). Management of diseases
(13). Yield

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(01). उत्पत्ति

इस विधि का प्रयोग प्राचीन काल से ही भारत के धान उत्पादक राज्यों जैसे, छत्तीसगढ़, मध्यप्रदेश, उड़ीसा और झारखंड के कृषकों द्वारा किया जा रहा है। यहां धान मुख्य फसल के रूप में उगाई जाती है, तथा कुल्थी गौंण फसल के रूप में ली जाती है। मध्य भारत का छत्तीसगढ़ राज्य इसकी उत्पत्ति स्थान है।

(02). महत्व

अधिक उत्पादन: समान भूमि में दो फसल लेने की वजह से अधिक उत्पादन होता है। यहां अधिक उत्पादन से तात्पर्य दोनों फसलों के सम्मिलित उत्पादन से है। इस विधि से समय, पैसे और मजदूरी/मेहनत की बचत होती है।

(03). जलवायु

लगातार वर्षा वाले क्षेत्रों में इस विधि को नहीं अपनाया जाता है। खरीफ सीजन में अच्छी बारिश और रबी सीजन में एक लंबी dry spell तथा ठंड वातावरण अच्छी मानी जाती है।

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(04). फसल का चुनाव

किसी भी फसल या फसल के समूह को इस विधि में शामिल नहीं किया जा सकता है, यही वजह है कि इस विधि में फसल का चुनाव बहुत महत्वपूर्ण है।

(05). स्थल का चुनाव

जगह या स्थल का चुनाव उचित फसल प्रबंधन हेतु अति आवश्यक है। इस बिंदु पर ध्यान देना महत्वपूर्ण है कि भूमि में अगली फसल के जीवनचक्र पूर्ण करने हेतु आवश्यक नमी की उपलब्धता बनी रहे। नमीयुक्त निचली भूमियां जिसमें जल का ठहराव लम्बी अवधि तक रहता है, वह भूमि सबसे ज्यादा उपयुक्त होती है।

(06). उचित समय

गर्मी और बरसात इसके लिए उचित समय नहीं मानी जाती है। खरीफ मौसम में लगे फसल की कटाई का समय इसके लिए सबसे उपयुक्त होती है।
नवंबर का महीना इसके लिए आदर्श है।

(07). फसल लेने की विधि

खरीफ के मौसम में धान की बुवाई करें।
नवंबर के मौसम में धान के फसल की कटाई करें।
अब खेत में धान के stalk ही बच जाते हैं।
खेत की जुताई न करें।
Stalk के बीच ही छिड़काव विधि से कुल्थी या lathyrus के अनुसंशित बीजों की बुवाई करें।
इसे धान की फसल की कटाई के 21 दिनों पहले करते हैं।

Lentil, gram, pea इत्यादि की खेती की जा सकती है।

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(08). खरपतवार नियंत्रण

बाद की अवस्था में अधिक खरपतवार दिखने से हाथ के द्वारा खरपतवार का नियंत्रण किया का सकता है।

(09). खाद एवं उर्वरक प्रबंधन

क्योंकि धान के खेत में पहले से ही उर्वरक का उपयोग कर लिया गया होता है, इसलिए अलग से कार्बनिक खाद या रासायनिक उर्वरकों के उपयोग की आवश्यकता नहीं पड़ती है।

(10). ध्यान देने योग्य बातें

धान के फसल की कटाई के 21 दिनों पूर्व गौण फसल की बुवाई की जानी चाहिए।
खेत से खड़ी जल का निकास बहुत जरूरी है।
गौण फसल की कटाई समय से पहले नहीं की जानी चाहिए।

(11). कीट प्रबंधन

अन्य दलहनी फसलों में लगने वाले कीटों से ही इस फसल को क्षति पहुंचती है। नियंत्रण उपाय भी समान होते हैं। उदाहरण- फली बेधक के नियंत्रण हेतु उपयुक्त कीट नाशक जैसे, chlorpyriphos का उपयोग किया जा सकता है।

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(12). रोग प्रबंधन

अन्य दलहनी फसलों में लगने वाले रोग से ही इस फसल को क्षति पहुंचती है। नियंत्रण उपाय भी समान होते हैं। उदाहरण- Powdery meldew के नियंत्रण हेतु उपयुक्त कवक नाशक जैसे, कॉपर युक्त कवकनाशी का उपयोग किया जा सकता है।

(13). उत्पादन

सकल फसल उत्पादन में कोई कमी नहीं आती है। इस तरह धान से मिलने वाला उत्पादन और कुल्थी से प्राप्त उत्पादन, प्रति एकड़ फसल उत्पादन को बढ़ा देते हैं।

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